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स्वप्न और उच्छ्वास

कविताएँ · Hindi poems, mostly from my school days

स्वप्न


जो लड़खड़ा रहा हूँ मैं क्या स्वप्न का ये अंत है। जो तिलमिलाता है कहीं, वो दूर है या है यहीं। जो सिसकियाँ हूँ सुन रहा, वो कौन रोता है कहाँ। जो द्वीप की तलाश में है नाव गोता खा रही, वो नाव में हूँ आज मैं या नाव मैं ही बन गया।
है स्वप्न ये या स्वप्न से अधूरी टूटी नींद है? कुछ जल रहा है सच में या जली हुई उम्मीद है? जो स्वप्न ही है सच अगर तो जागकर मैं क्या करूँ! आरंभ ही जो अंत है, तो अंत से मैं क्यूँ डरूँ?
↑ अनुक्रम

साथ अगर जो तुम होती


ग़म के सागर के बीच हुए, जीवन-सुख के इस मधुर मिलन में, साथ अगर जो, तुम होती! -2
दुख-सागर के जलजात लहर से ही अब तक बढ़ता आया मैं, हर लहरों से आज तलक बिन तेरे ही लड़ता आया मैं।
पर आज मिली सुख की नैया तो, दिल ने हर्षित हो मुझे कहा -
ग़म के सागर के बीच हुए, जीवन-सुख के इस मधुर मिलन में; साथ अगर जो तुम होती।
अँधियारों के इस सागर में, जाने कितने तूफ़ाँ आये। भटका मैं कितनी बार यहाँ, काले घन कितने हैं छाये
ख़ामोश रहा यह आस लिए, इक दिन दुःख ये झर जायेंगे। तुम जब मुझको मिल जाओगी, बादल सारे छट जायेंगे।
पर पूर्व मिलन की छोटी सी, ख़ुशियाँ जो मिली मेरे दिल को। तब इसने उन्मादित होकर, रोकर चुपके से मुझे कहा -
ग़म के सागर के बीच हुए जीवन सुख के इस मधुर मिलन में साथ अगर जो तुम होती।
कि वर्षों से आदर्श मेरे, तारे भी मुझको दिख न सके। काले-काले घन की बूँदों संग मेरे ये आँसू बरसे।
दुःख जलधि के तूफ़ाँ में भी, किस तरह मैं आगे बढ़ पाया।
तारे सूरज औ' चाँद बिना, अंधेरों में चलता आया।
पर देख कहीं की झिलमिल को, दीपक-लौ समझा मेरा मन, औ' आह्लादित होकर रोकर धीरे धीरे से मुझे कहा -
ग़म के सागर के बीच हुए जीवन-सुख के इस मधुर मिलन में साथ अगर जो तुम होती।
मैं कैसे-कैसे चल पाया हूँ, काश तुझे बतला पाता। इस दुखद सफर के सुखद प्रहर में, साथ जो तेरे हो पाता।
फिर भी तेरी ही आस लिए, चल रहा हूँ मैं तो सदियों से। दिल में छोटी सी प्यास लिए चल रहा हूँ मैं तो सदियों से।
पर अंधेरों में इक नयी रोशनी सी जो दिखी है मुझको तो चुप होकर औ' खुद में खोकर मैंने चुपके से दिल को कहा
आने वाली उस नौका में काश अगर जो तुम होती।
↑ अनुक्रम

आह्वान


तुझको पुकारा आज फिर मेरे हृदय ने!
सावन - घटा घनघोर थी छाई हुई, मन में नयी थी एक मादकता भरी। जलनिधि लहर सम मैं तरंगित हो उठा, ऐसा लगा तुमने मुझे जैसे छुआ।
खुशियों भरी उन्माद के हों इस समय में, आज फिर तुझको पुकारा इस हृदय ने।
खोकर खुदी को खोजने फिर मैं चला, तस्वीर, तेरी बादलों की नीर में। हर बूँद में दिखने मुझे जब तू लगी, दिल में नयी तब एक सुंदरता जगी।।
सौंदर्य पूरित दिल के हैं मधुमय निलय में, आज फिर तुझको पुकारा इस हृदय ने!!
स्याह नभ में भी एक दिख चाँद था, हाँ बादलों से भी भरी उस रात में। मग्न होकर देखने फिर मैं लगा, मुखड़ा तेरा उस रात की बरसात में।।
दिल में बजे संगीत के हर एक लय में, आज फिर तुझको पुकारा इस हृदय ने!!
↑ अनुक्रम

मैं कवि नहीं


मैं कवि नहीं कोई रस का, मैं तो बस व्यथा सुनाता हूँ। जिसमे विराग का भाव भरा, मैं राग वही तो गाता हूँ। मैं कवि - - - - - - -
रूठे कितने अपने मुझसे, मेरी कविता का भाव यही, आये थे जो भी साथ मेरे, वो गये छोड़ हाँ मुझे कहीं।
ले भाव यही हर वक्त, सदा मैं अपनी कलम चलाता हूँ। मैं कवि नहीं कोई रस का, मैं तो बस व्यथा सुनाता हूँ।
देख व्यथा चंदा चकोर की, बादल के बिन दशा मोर की। करुणा जो फूटती है दिल में, तब कलम रोक नहीं पाता हूँ।
मैं कवि नहीं कोई रस का, मैं तो बस व्यथा सुनाता हूँ।
↑ अनुक्रम

शक्ति और संकल्प


मैं राह बनाता हूँ साथी, पर साथ मेरे तुम भी आना। ख्वाबों के इस मंजिल पथ पर, हाँ अब भूल कहीं न तुम जाना।
तेरे पदचापों को ही सुन, मैं कदम बढ़ा ये पाऊँगा। तेरी खुशबू से ही तो मैं, पथ को सुरक्षित कर पाऊँगा।
पथ-कंटक दूर हटाता हूँ, तुम प्रेम इसे देती जाना। मैं राह बनाता हूँ साथी, पर साथ मेरे तुम भी आना।
मैं भाग्यवान हूँ जो तेरा, ये साथ मुझे है अभी मिला। है शक्ति मिली हर रज-कण को, हर सपनों को विश्वास मिला।
संकल्प किये मैं जाता हूँ, तुम शक्ति मुझे देती जाना। मैं राह बनाता हूँ साथी, पर साथ मेरे तुम भी आना।
पथ के रज-कण हैं एक नहीं, अब एक इन्हे करना होगा। और रुके नहीं ये जग सारा, इसलिए हमें बदलना होगा।
मैं साहस देता जाता हूँ, विश्वास नया देती जाना। मैं राह बनाता हूँ साथी, पर साथ मेरे तुम भी आना।।
↑ अनुक्रम

प्रियतम कहो


I
अपने पथ का पाथेय कहाँ, कुछ भी तो बच पाया है? प्रियतम कहो क्या लौट चलें, मन मेरा घबराया है?
मंजिल की यादें मुझे सदा, रह रहकर तड़पाती है; तड़प भरे इस पथ पे जाने, तूफाँ कैसा आया है। प्रियतम कहो - - - - - - -
सफर आधा जब बचा हुआ है, मन टूटा जाता है, हर कोने में इस दिल के भय, जाने कैसा छाया है। प्रियतम कहो - - - - - - -
जब भरी पड़ी काँटों से ही, आगे की वो राहें हैं, आहों से ही तो भरा हुआ पथ ये कैसा आया है। प्रियतम कहो - - - - - - -
II
नहीं प्रिय! हैं साथ जो हम, तो घबराने की बात है क्या? अब नहीं प्रिय! हम लौटें मत, अब ही तो समर आया है। खत्म हुआ है आधा सफर अब पीछे मुड़कर मत देखो, चुभने दो उन काँटों को जो चुभता अब तक आया है। अब नहीं प्रिय! - - - - - - -
प्रेम शक्ति से हम चल लेंगे, पथ जो भी बच पाया है, अपना अब तक तो प्यार यही पाथेय बना आया है। अब नहीं प्रिय! - - - - - - -
↑ अनुक्रम

धुआँ से ही


धुआँ से ही बना रहा, सदा से मेरा आशियाँ, कभी तो ख्वाब में भी मेरे वो परी मिली नहीं।
जिसपे मैंने लिख दिया, न जाने ग़ज़लें कितने ही, कमल सी उसकी आँखे मेरे सामने खुली नहीं। धुआँ से ही - - - - - - -
मुस्कान जिसकी देखकर कि शर्म खायी चाँदनी, सामने मेरे कभी तो वो कभी खिली नहीं। धुआँ से ही - - - - - - -
संग जिसके मैं चला जमीं से लेके चाँद तक, इक कदम भी संग मेरे वो कभी चली नहीं। धुआँ से ही बना रहा - - - - - - -
पूछता रहा जहाँ कि है कहाँ और कौन 'वो', मगर मुझे तो आज तक 'वो', कभी मिली नहीं। धुआँ से ही बना - - - - - - -
↑ अनुक्रम

आज प्रीतम


आज प्रीतम, प्रीत तेरी, मैं करूँ स्वीकार कैसे?
जिस जहाँ ने तो सदा से प्यार को समझा गलत है, उस जहाँ के सामने, बोलो, करूँ मैं प्यार कैसे? आज प्रीतम, . . .
↑ अनुक्रम

जब कभी


जब कभी भी मैं सफर में टूट जाता हूँ, जिंदगी से भी कभी जब रूठ जाता हूँ। है मेरा कुछ भी नहीं ऐसा जो लगता है, और भीतर जब कभी तूफाँ सा जगता है। उस समय भी पास आकर तुम मनाती हो, टूटे हुए अरमान को तुम ही सजाती हो।
↑ अनुक्रम

नया साल नयी आशाएँ


नये साल में कोई भी, रूठे न किसी से दुनिया में। नये साल में कोई भी, टूटे न किसी से दुनिया में।
नये साल के रंगों में, अब इंद्रधनुषी मान मिले। विश्वास किसी का न टूटे, हर अधरों को मुस्कान मिले।
जग के क्रंदन से बहे नीर, को भी अब इक अरमान मिले। अश्रु सिंधु की लहरों को भी, नयी-नयी पहचान मिले।
नये साल की नयी सोच से, सबको अब सम्मान मिले। विश्वास किसी का न टूटे, हर अधरों को मुस्कान मिले।
↑ अनुक्रम

वह तारा


वह तारा जिसे मैं रोज देखता हूँ आकाश के एक कोने में चमकता हुआ,
पिछले साल जब मैंने उसे देखा था पहली बार हजारों तारें चमक रहें थे उसके पास मगर सबसे ज्यादा चमक उसी की थी।
पता नहीं क्यों धीरे-धीरे सभी तारें दूर हो गये उससे और आज मैंने जब उसे देखा तो भर आयी मेरी आँखें
क्योंकि उस कोने में, आज वह अकेला था
परन्तु मुझे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि उसकी चमक आज भी उतनी ही थी!
आज भी वह मुस्कुरा रहा था उसी तरह जिस तरह मैंने उसे पहली बार देखा था!
↑ अनुक्रम

रोता कब था! कब रोता हूँ!!


रोता कब था! कब रोता हूँ!!
काली रातों की बाहों में, तारे ही गिनते नयनों को जब, सपने झिलमिल लगते हैं तब, आह हृदय की सुन लेता हूँ।
रोता कब था! कब रोता हूँ!!
दूर कभी मंजिल लगती जब, और भटका सा राह लगे, तब हाथ पकड़ अपने साथी के, नयननीर संग बह लेता हूँ।
रोता कब था! कब रोता हूँ!!
चलते चलते जीवन पथ पर, थक जाता है जब मेरा मन, तब छिपकर तकिये के नीचे, फूट-फूटकर गा लेता हूँ।
रोता कब था! कब रोता हूँ!!
देख जहाँ मेरे आँसू को पागलपन कह हँसता है, पर पोंछ नयन के नीर हमेशा, हँसकर जग से कह देता हूँ –
रोता कब था! कब रोता हूँ!!
जिसे लोग आँसू कहते हैं, वो अमृत मेरे जीवन का, छिपकर जग के कोलाहल से, उससे दिल तो मैं धोता हूँ।
रोता कब था! कब रोता हूँ!!
↑ अनुक्रम

पुनर्निर्माण


उस नीड़ का निर्माण करने मैं चला हूँ आज फिर।
आँधियों के उन क्षणों में, छोड़ जिसको थे दिये तुम। छिन्न-भिन्न जिसके तृणों को देख भी लौटे नहीं तुम।
पेड़ टूटे, सूखी पत्तियाँ, थे जो नव-कोंपल मुरझाए। सूख गयी नवजात कलियाँ, बिन तेरे पर तुम नहीं आए।
मैं मगर तेरे बिना ही चल पड़ा हूँ आज फिर, उस नीड़ का निर्माण करने मैं चला हूँ आज फिर।
आज हाँ तेरे बिना ही, फिर बनेगा इक सदन। जिसमें जलेगा दीप जो, दीपित करेगा ये भुवन।
थे उस दीया के घृत तुम, और जो जले वो बाती मैं। पर तुम गये जब छोड़ के, तब बुझ गया था ही वहीं मैं।
पर तिमिर का अंत करने मैं अकेला ही जला हूँ, आज फिर, उस नीड़ का निर्माण करने मैं चला हूँ आज फिर।
↑ अनुक्रम

अच्छा लगा


I
अच्छा लगा जो तुम मिले पहली दफ़ा मुझसे ।
II
अच्छा लगा पहली दफ़ा तड़पा जो मैं मिलके यहाँ तुझसे ।
III
अच्छा लगा पहली दफ़ा हाँ देखके आँसू, कमल सम नैन में तेरे ।
IV
अच्छा लगा पहली दफ़ा जब चाहा मैं जीवन में हाँ दिल से कहीं किसीको ।
V
अच्छा लगा पहली दफ़ा ये जानकर तुझसे यहाँ कि प्यार में होता है हाँ कुछ दर्द भी ।
VI
अच्छा लगा, पहली दफ़ा, समझा जो मैं, हर वक्त हाँ, दिल से कभी, तुमने कहीं चाहा नहीं, मुझको ।
↑ अनुक्रम

परिस्थितियाँ और सोच


मेरा परिचय, बस इतना ही - मैं एक मुकुल, खुशबू विहीन ।
खुशियाँ छाई, आने से मेरे, खुशीहीन, सूखी बगिया में ।
फिर बढ़ा मैं, लड़ते हुए । जीवन समर में, मैं अकेला ।
जन्म लिया मैं, उस बगिया में, सूखा था जो, कई बरसों से ।
आशाएँ बनी, इक चाह जगी । सूखे पत्तों में सुमनों की ।
सूखी पत्तियाँ; हाँ कई बार । सहचरणी बन जो, रहती थी ।
सौंदर्य हीन, मेरे समान, थी सूखी कलियाँ और कई ।
बगिया होगी, फिर हरी-भरी । सब सुमन सोच, पुलकित हो उठे ।
रूठा भी मैं, उनके खोने से । रुका नहीं हूँ, आज तलक पर ।
जिन्हें देख, यह बोध हुआ कि - संघर्ष ही है सार जीवन का ।
↑ अनुक्रम

सीख : तारों की


I
मन विकल वेदना से संचित, था उर में दर्द-ए-जहाँ भरा । अश्रुपूरित नयनों में था, हाँ इक करुणा का नव-गान भरा ।
मैं रुदन सिंधु से निकला तो, सम्मुख विस्तृत आकाश मिले । तारों से खचित, आभूषणमय, नभ मेरे कितने पास मिले ।
शशि, पनघट सम उस अंबर में, थी सुधा थाल सम चारुमयी । सौंदर्य बसा था स्याह में भी, जिसे मन-व्यथा न देख सकी ।
करुणामय हृदय को कभी क्या, हो सकता है सौंदर्य-बोध है ? अश्रु में खुशी को पाने चला, तू हाय रे मन कितना अबोध ।
आँसु के कण बरसाता है, फिर जगके मरु में आज तू क्यों ? खिल सकता ऐसे में मुकुल नहीं, फिर खुशी चाहता उनसे तू क्यों ?
था इन्हीं भावना के कारण, डूबा मन अश्रु सिंधु में । बह रहे नीर थे नैनों से, फिर देख उन्हें हाँ इन्दु में ।
II
संभाल न खुद को जब पाया, तो पूछा नभ के तारों से -
ओ ! अनंत द्युति के संवाहक, पहुँच गया कैसे वहाँ तू । कैसी थी तेरी जिंदगी, कैसा था ग़म, थी कैसी खुशी ।
संकल्प क्या तेरा कभी, टूटता था तुझसे नहीं ? रस्ते क्या तेरे कभी, छूटते थे तुझसे नहीं ?
क्या कभी अपनी जिंदगी में, तू स्वयं से हारा नहीं था ? अपना क्या तुझसे कभी, हो गया पराया नहीं था ?
हर बार क्या ठोकरें तूने, खुद से नहीं खायी थी ? मंजिल क्या तेरी कभी, हुई नहीं पराजय थी ?
क्या कभी तेरे हृतल में, लहर उठती थी नहीं ? जब समझ पाते वो नहीं तुमको कभी थे ।
रुदन के सागर में जाके क्या कभी तेरा ये मन रोता नहीं था ?
हृदय की उस वेदना को, तू कहाँ कैसे छुपाता था ?
वेदना से भीगते थे, नैन तेरे, क्या नहीं ?
विजन में जाके हमेशा, क्या नहीं रोता था तू ? उस समय, जब रुठ जाते थे तेरे अपने ही तुमसे ।
हारने के बाद जब ये, रुठता था मन तुझी से, तू उसे कैसे मनाता था ?
बार-बार के हार से जब, टूटता था तू खुद से, आपगा सम लहरमय इस जीवन में हार के ही बीच, कैसे तू खुशी को ढूँढ पाता था ?
उत्साह पाया तू कहाँ से, आज बतला दे मुझे । अपनी चमक का राज़ तू, अब आज समझा दे मुझे ।
करुणाप्रेरित नयन से, अश्रु मेरे बह रहें जो आज हैं, रोक दे तू वेदना के इस लहर को अब हमेशा के लिए
आज तक समझा नहीं, मुझको किसी ने । तू समझ मेरे प्रिय, ओ चन्द्रालंकार, आदर्श जगत के शशि के श्रृंगार ।
III
इस तरह देख निराश मुझको, एक तारा लगा बोलने मुझसे :-
मैं भी तो टूटता हूँ, आसमाँ से रुठता हूँ । दिखता हूँ किसी दिन तुझे, तो खोता हूँ कभी आसमाँ में ।
मुझको भी लगता है ग्रहण, ढकती मुझको है तेरी धरा । होता है मेरा भी तो अंत, रुठता है जब मुझसे अनंत ।
मैं ही नहीं सबसे महान, लाखों हैं भुवन में मेरे समान । बढ़ना है तुझे तो चलता चल, बढ़ रहा जगत मत हो अचल ।
चलना है आदि जीवन का, रुकना मग में है इसका अंत । सपनों के दीप जलाता चल, राहों में हैं मंजिल अनंत ।
पथ के काँटों की नोकों को, कदमों से कुचल तू राह बना । चट्टान भी गर आयें मग में, चट्टानों से टकराता चल ।
रोकेगा न कोई तुम्हें यहाँ, तू अपना कदम बढ़ाता चल । संघर्ष साथी है जीवन का, संघर्ष को गले लगाता चल ।
क्या रोक सका है नग, नद, की उस धारा को, जो है प्रचंड । तू कदम बढ़ा, हाँ बढ़ा कदम, तू कदम बढ़ा और हो अखंड ।
हर रोज नये सपने बनते, हर रोज नये अपने बनते । रूठों के लिए वो रोते नहीं, जो मंजिल के पथ पर चलते ।
टूटेंगे सारे सपने भी, रूठेंगे तुमसे अपने भी । पर टूटना न तू कभी, रूठना न तू कभी ।
संकल्प टूटते हैं सबके, रस्ते भी छूटते हैं सबके । संघर्षों की इस दुनिया में, अपने भी रूठते हैं सबके ।
तू रोक गगन, तू रोक पवन, दुनिया की झूठी रीत बदल दे । तुझसे ही जग का राग है ये, खिला जो सारा, रीत बदल ।
अपने आँसु कण बरसा के, इस जग की मरु को सिंचित कर । सौंदर्य यही है करुणा का, जग-खुशी में सबकुछ अर्पित कर ।
मन है अबोध तेरा नहीं, जो खुशी ढूँढता आँसु में । आँसु में दिखता असल सत्य, सौंदर्य बसा है आँसु में ।
कल का तो तारा तू ही है, श्रृंगार निशा का, तू ही शशि । पथप्रदर्शक है ध्रुव तू, सृष्टि का जीवन, तू ही रवि ।
IV
मंजिलों की राह में, हर मोड़ पर हाँ, एक नया तूफान आता, तोड़ देता, जो सभी, सपने नये, सुंदर सुरीले । लूट लेता, ख्वाब के संसार को । फिर रूठ जाते वो भी जो आगे कभी थे, जिंदगी में राग बनके ।
संघर्ष कर पुरुषार्थ से, जीत लेते, हार को भी, नए वो जो, मंजिल के पथ पर, हर दुखों को छोड़कर, अनवरत चलते रहे हैं ।
तूफान भी थम जाता है, संघर्ष उनका देखकर, आते हैं वो भी लौटकर, जो छोड़कर थे जा चुके ।
ये सभी हैं सत्य जीवन के, इसे स्वीकार ले कि - हर दुःखों के बाद जीवन में, नया उल्लास आता है, नये सपने हैं सजते, फिर हमेशा की तरह, नवदीप जलते हैं, खुशी के ।
फिर खलता है क्यों अभी तू रूठ मत संघर्ष कर -
इक का नहीं तू हमसफर, है इक नहीं तेरी प्रिया । है कर्म तेरी संगिनी, है कर्म तेरी भार्या !
V
कीर्ति रश्मियाँ सभी, हैं राह देखती तेरी, अजेय तुम उठो अभी, रुको नहीं, रुको नहीं ।
भारती का भार है, ओ धीर प्राज्ञ, ओ प्रखर, समीर सम तू कभी, रुको नहीं, रुको नहीं ।
कनक सरिस चमक तेरी, द्युती नहीं घटे कहीं, कि सूर्य तुम चले-चलो, रुको नहीं, रुको नहीं ।
मयंक स्याह नैन का, सुधामयी तू चंद्रिका, शशि प्रभा चले-चलो, रुको नहीं, रुको नहीं ।
अवनि तनय प्रवीर तू, प्रबुद्ध ज्ञान वीर तू । राष्ट्र विभूति सुधे, रुको नहीं, रुको नहीं ।
अनंत-विस्तृत उरे, उथल-पुथल मचे नहीं । ज्वलंत कल्पना करे , रुको नहीं, रुको नहीं ।
VI
आदित्य तू नवविश्व का, नवज्ञान का आलोक तू । तू इस धरा का मान है, है खुद नया तूफान तू ।
अंधकार इस संसार का, हाँ दूर होगा तुमसे ही । अब मत बुझा, हाँ अब मत बुझा, खुद को अभी तू मत बुझा ।
मत हार तू उस हार से, जो क्षणिक है तेरे लिए । संघर्ष कर तूफान से, जगप्रीति पाने के लिए ।
तू दीप है, संसार का, तू गीत है, हर प्यार का । पहचान तू, पहचान है, खुद को अभी से जान रे ।
हार से मत हार रे, तेरा सकल संसार रे । जीत से गर प्रीति है तो, हार भी स्वीकार रे ।
↑ अनुक्रम

तेरा स्वर


सुधामयी इस सुखद प्रहर में कुछ तो बोलो, हे प्रियवर संग मेरे सारी दुनिया है उत्सुक सुनने तेरा स्वर ।
↑ अनुक्रम

आज खिलने दो मुकुल को।


भ्रमर के इक प्रीत के बिन, है झुलसते रात औ' दिन। कब तलक नाले-नहर के बीच खड़ते ये रहेंगे, कब तलक संसार से हो दूर बढ़ते ये रहेंगे।
भ्रमर के हर प्रीत से तो आज मिलने दो मुकुल को। अब नहीं किरणों को रोको, आज खिलने दो मुकुल को।
↑ अनुक्रम

तुम


मेरी चाहतों को आके रूप है दी आपने, आपसे ही सजता कि मेरा ये महफ़िल है। दूर हो भले ही आप मुझसे मगर, इस दिल में मेरा तो आपका ही दिल है।
है मेरी ये तमन्ना कि याद मुझको रखना, कि तुमको मैं भुला दूँ हाँ काम ये मुश्किल है। ये धड़कन, ये साँसे तुझी पे क़ुर्बाँ है, रास्ता मेरा तू, औ' तू ही तो मंज़िल है।
पहचान मेरी है तू, अनजान सी परी है, मेरी ख़ुशी के लम्हों में तू ही तू खड़ी है। क्यूँ सता रहे हो, अब तो पास आओ, बिन तेरे ओ प्रियतम बेजान सा ये दिल है।
↑ अनुक्रम

कविता से रूठे शब्द


1.
मेरी दास्ताँ बेज़ुबाँ है, समझता जिसे कोई कहाँ है, दिल के दर्द को दिल में ही रखता हूँ, फिर भी ख़फ़ा मुझसे सारा जहाँ है।
2.
क्यूँ तुझे मैं चाहकर भी भूल पाता हूँ नहीं ? ज़िंदगी मेरी बनी हो क्यूँ ओ प्रीतम आज भी? हर तरफ़ ख़ामोशियाँ हैं, छा रही तेरे बिना, ख़ामोशियों में भी सदा आवाज़ क्यूँ देती रही ?
↑ अनुक्रम

मैं कवि नहीं जिसके दिल में


मैं कवि नहीं जिसके दिल में, भावो की सरिता बहती है। मेरी तो रूठी कविता को, दुनिया तुकबंदी कहती है।
तुम भी कविता मेरी सुनकर, हँस दोगे ये डर लगता है। फिर भी हाँ आज निडर होकर, मेरा कवि तुमसे कहता है! -
भाव सभी रूठी कविता की, प्रियतम! मेरी हाँ तुम ही हो। तुम कौन हो मैं ये न जानूँ, पर भावों की ध्वनि तुम ही हो।
↑ अनुक्रम

रूठा राग


मैं जगत का गीत बनना चाहता हूँ, मैं किसी का मीत बनना चाहता हूँ।
पर न जाने आज तक क्यों, साथ किसी का मिल न पाया। बन सका न आज तक मैं, हाँ किसी का भी इक साया।
हाथ पकड़ा था किसी का, स्वप्न के उस गोद में। औ' ख़ुशी से झूमता था, साथ उसके मोद में।
पर न जाने स्वप्न से भी, साथ गया छूट अब क्यूँ? वह सुनहला राग, जाने गया है रूठ अब क्यूँ?
↑ अनुक्रम

जब एक अपना रूठता है


टूटते हुए देखा है मैंने सामने एक परिवार को घर के लोग बिछड़ रहे थे पर किसी की आँखे भरी नहीं शायद कोई विवाद होगा मैंने ये सोचा।
टूटते हुए देखा है मैंने, डाली को एक पेड़ से, सारे पत्ते नीचे गिर रहे थे पर पेड़ ने उसे रोका भी नहीं। शायद वे लाचार होंगे, मैंने ये सोचा।
पर जब एक सपना टूटता है, जब कोई अपना छूटता है तो क्या होता है, मैंने उसे भी देखा है, इन्हीं आँखों से, मैंने तो रोका भी पर नहीं रुका वो शायद रूठा होगा मुझसे मैंने ये सोचा।
↑ अनुक्रम

तुम कहाँ हो ?


आसमाँ के तारों को देख करके, मन हमेशा पूछता है - इस गगन में, तुम कहाँ हो ?
जलधि सम इस शांत चित में, है कभी लहरें जो उठती, तो नया तूफ़ान आता, जी मचलता, आग लगती इस बदन में।
बदलूँ दिशायें इन पवन की, इक नया संसार रच दूँ। इन सभी के बीच में, मुझको नया विश्वास देकर, मन हमेशा पूछता है - बदलते जहाँ के, इस समय में, तुम कहाँ हो ?
वक्त की बदली अदायें, इक नया जब राग जागा, रीत बदली इस जगत की, हार का सब भीत भागा। चाह आयी, चाहने की इस जगत को। सबको बदल दूँ, जीत लूँ दुनिया के दिल को।
पर 'अभी' को जान करके, मन हमेशा पूछता है - खुशियाँ भरी संसार के हों, इस क्षण में, तुम कहाँ हो ?
↑ अनुक्रम

दृष्टि


ये आँखें कुछ कहना चाहती हैं बताना चाहती है - तड़प जिंदगी की, परिणाम चाह का और दर्द नजरिया का।
सब कुछ दिखाना चाहती है लोगों को, अंधेरे में भी, खुद की नूर से।
अब तड़प ही इसकी कहानी है और शायद आवाज भी। चमक उठती थी कभी ये देख कर जिसे, हटती थी ही नहीं जिस सूरत से, आज उसे देख सहम जाती है, और शर्म से झुक जाती है, ये आँखें जो कुछ कहना चाहती है।
सच्चाई किसे बताये फरेबों के बीच, हर कोई हो गया है पराया जब यहाँ जब रूठ गया हो अपना ही खुद से तो दुनिया क्या समझेगी दर्द का कारवाँ
संसार की बेरहमी को शायद भूल जायेगी ये क्योंकि, खुद को पहचानती है ये और जानती है, दुनिया की हकीकत को, हसरत की सच्चाई और समय के बदलते अंदाज को बदलती सोच और बदलते समाज को। और शायद उस सूरत को भी...
↑ अनुक्रम

मैं और तुम - I (हमारी कल्पना)


अब साथ रहूँ मैं तेरे ही, जिंदगी ये मुझसे कह रही। मेरा ये जीवन तेरा हो, हाँ ! चाहत अब इक रही यही।
चाँदनी बन तू मुझ चाँद का, जग में जिससे उजियाला हो। मिट जाए रजनी नफरत की, इंसान प्रेम का प्याला हो।
उन प्यालों के हाला हो हम, कर दें मतवाला इस जग को। प्रेम-सुधा का पान करायें, आ मिलके हम दोनों सब को।
मतवालों को उस दुनिया में, हम प्रेम लुटानेवाले हों। फिर जागे सबमें प्रेम पिपासा हम प्यालों के रखवाले हों।
खोलो नयन, ओ! मृगनयनी और देखो, मनुज कितना सानन्द होगा। प्रेम से युक्त उस दुनिया में, वाह! कैसा आनंद होगा।
जहाँ लोग प्रेम को पूजेंगे, क्या कहीं वहाँ वे गम होगा? न द्रौपदी चीर-हरण होगा, न महाभारत का रण होगा।
इंसान सभी हाँ सम होंगे, जब प्रेम कभी न कम होगा। देवत्व सभी ही पायेंगे, जब हम दोनों एक हो जायेंगे।
मानवतामय उस दुनिया का आ प्रेम से निर्माण करें। बन शिव-उमा हम दोनों नफरत-विष का विषपान करें।
जब हलाहल कंठ से उतरेगा, उसे रोक जग को बचाना तुम। मैं नीलकंठ कहलाऊँगा, और, जगदम्बा बन जाना तुम।
क्या मिल सकते नहीं हम दोनों पूरा करने ये सब सपने। आ साथ दे ओ चन्द्रमुखी, चल नव-जग का निर्माण करने।
↑ अनुक्रम

मैं और तुम - II (तुम्हारी उत्कृष्टता)


तू गीत है, मैं राग हूँ। है कंठ तू, आवाज़ हूँ। तेरे बिना मैं कुछ नहीं। तू है जहाँ मैं भी वहीं।
तू गर धरा, मैं धूल हूँ। खुशबू अगर मैं फूल हूँ। हूँ चाँद मैं तू चाँदनी। मेरे लिए ही तू बनी।
तू जिंदगी मैं चाह हूँ। तू मंजिले मैं राह हूँ। मैं चाहतें तू प्यार है। बगिया हूँ मैं तू बहार है।
तुमसे बने दुनिया मेरी। मुझसे बने दुनिया तेरी। है ख्वाब अब इतना सा ही।
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मैं और तुम - III (मेरी तुच्छता)


तू शांत सुधामय निश्चल जलधि, मैं लहरमय आपगा हूँ। ढूँढता फिरता कहीं से, पास तेरे आ गया हूँ।
दे जगह अपने हृदय में, कि मैं तेरे पास रह लूँ। मैं हमेशा हर दुःखों को, अब तो तेरे साथ सह लूँ।
मेरी खुशी मेरी उदासी, है तेरे प्रीति की प्यासी। चाहतें मेरी सभी हैं, बिन तेरे हो सिर्फ ख्वाब सी।....
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तुम्हारा चित्र


मैंने तुम्हारा चित्र बनाने को सोचा, मैं और चित्र! हँसी की बात है न?
बस यूँ ही बनाने लगा, जिसे मैंने बहुत पहले चुराई थी।
विश्वास नहीं करोगे, मैंने उसे एक भी बार नहीं मिटाया और कुछ ही देर में, एक बहुत ही सुंदर मुखड़ा बना दिया।
मुझे बहुत आश्चर्य हुआ क्योंकि मैंने एक चेहरा बनाया था! चाँद से भी सुंदर नहीं, उसकी उपमा चाँद से भी नहीं हो सकती है क्योंकि वह चित्र, मेरे दिल का उदगार था। पता नहीं कैसे,
स्वयं बन गया वह, मैं सिर्फ पेंसिल घुमाता रहा। शायद इसलिए कि, तुम मुझसे बहुत दूर हो;..
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दीप हूँ, जलता रहूँगा


जीवन पथ पर सदा, मैं अनवरत चलता रहूँगा, दीप हूँ, जलता रहूँगा।
है कर्म मेरा अनवरत ज्योति दिखाना, आँधियों का काम है मुझको बुझाना। किंतु उजियारों की खातिर, आँधी में पलता रहूँगा। दीप हूँ जलता रहूँगा।
मंजिलों की राह में, बाधायें लाखों आती हैं। पर पर्वतों से बार-बार, नदियाँ सदा टकराती हैं।
इक सरिता की चोट से, बालू अचल हो जाता है। उस बार-बार प्रहार से, राह स्वयं बन जाता है।
उस नदी की ही तरह, मैं तुंग से लड़ता रहूँगा। दीप हूँ, जलता रहूँगा।
वीरान सा उपवन में जब, जन्म मुकुल का होता है। बढ़ता है कोई तो, कोई मुरझा कर सोता है।
पर लड़ता है जो कष्टों से, जीवन वही हाँ! पाता है। खुशबू उसी को मिलती है, हाँ! फूल वही कहलाता है।
उस कली की ही तरह मैं, टूट के खिलता रहूँगा। दीप हूँ, जलता रहूँगा।
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उच्छ्वास


आज साँसों का समर्पण!!
आखिरी पत्ते बचे जो, आज सूखे से पड़े हैं, तेरी आँधी में करूँ मैं, खुद का अंतिम भाग तर्पण!
आज साँसों का समर्पण!!
आखिरी उच्छ्वास है ये, जो बचा है पास मेरे, अब न ज्यादा सह सकूँगा, पग में तेरे प्राण अर्पण!!
आज साँसों का समर्पण!!
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